Jo Dil Ki Tamanna Hai

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अपनी बात 

समय के साथ मानवमात्र के मन में ,दुसरो से आगे बढ़ने की ललक ने ,जैसे जैसे व्यस्तता बढ़ाई ,वैसे वैसे स्वार्थपरता ने दूसरो के प्रति उसकी तटस्थता  बढ़ाई है। मानव ने इसे एक नाम भी दिया है ‘सज्जनता ‘,जो कि ‘शराफत ‘के नाम से ज्यादा प्रचलित है। कुछ जुमले मुलाहिजा फ़रमाये -हम शरीफ लोग है हम क्यों इस पचड़े या विवाद में पड़े। ‘हमे क्या करना है। ‘ये जिम्मेदारी सरकारी निकाय ,पुलिस वगैरह की है। ‘वगैरह वगैरह। लीजिये कितनी आसानी से शराफ़त की आड़ में नैतिक ,सामाजिक ,नागरिक इत्यादि सभी जिम्मेदारियों से छुटकारा मिल गया। परिणाम स्वरूप ,दुष्ट जीवन पर्यन्त दुष्टता करते रहते है ,हम तटस्थ रहते है। यही नही जब जब वो प्रारब्धवश ,सरकारी अथवा सामाजिक निकाय के शिकंजे में फँस दीन  हीन बन मगरमच्छी आँसू  बहाते  है। तब तक हम उस निकाय की मदद करने की बजाय या तो निकाय को कसूरवार बताते है या तटस्थ रहते है। इस प्रकार अनजाने ही हम उस दुस्ट की मदद कर रहे होते है। कुछ लोग मरे को क्या मरना सोचकर अपने आपको सांत्वना भी देते है। वही दुष्ट  पासा पलटते ही शेर की तरह गरजकर पुनः दुष्टता करने लगता है। पर हम उससे भी कुछ नही सीखते।

एक दिन अपने कुछ मित्रो से वार्तालाप के दौरान ,ऐसे ही एक प्रकरण पर चर्चा करते हुए जब मैंने यही सवाल उठाया तो मेरे एक मित्र ने यही चिरपरिचित जुमला कहा कि ए भले आदमी ,मरे क्या मारना। मेरे पुन  प्रश्न  उठाने पर कि आप लोग देखते ही है कि दुष्ट को प्रोत्साहन मिलता है और बुरा समय गुजर जाने पर वो दूने  उत्साह से दुष्टता करने लगता  है। मैं कुश्ती लड़ने को नही कहता ,पर बाद में पछताने के स्थान पर अगर हम यथा सम्भव उस सरकारी अथवा सरकारी निकाय की मदद करे या कम से कम दुष्ट से मुह ही  मोड़ ले तो ऐसी नौबत ही क्यों आये। इस पर एक अन्य मित्र ने कहा कि  ये कौन सी किताब में लिखा है। सदैव सुलभ एवं प्रिय भारतीय वाद- विवाद से बचने के उद्देश्य से मैं  प्रत्यक्ष में मौन रहा पर मन ही मन कहा ‘यदि नही लिखा तो लिखा जाना चाहिये ‘ घर आया ,सोचता रहा। मस्तिष्क कहता  है कि सारी उम्र तो बीत गयी दुनिया की खिंच पिच को देखते ,अब क्या लिखना और क्या न लिखना। पर ह्रदय समझाता ,नौजवान इसलिये नही लिखते कि जीवन में विवादों से बचते हुए आगे बढ़ना है,बहुत कुछ करना है। तुम इसलिए न लिखो कि तुम्हे क्या करना है। क्या इस प्रकार तुम दुष्टो को बढ़ावा नही दे रहे ?कहाँ  है तुम्हारी हर आड़ी -तिरछी बात पर मचल उठने वाली कलम ?कब तक उसका मुँह बांधे रहोगे ?तभी परम  पूज्य दिनकर जी की पंक्तिया याद हो आयी –

‘समर शेष है ,नही पाप का भागी केवल व्याध ,

जो तटस्थ है ,समर लिखेगा उनका भी अपराध। ‘

और मस्तिष्क का सिर लज्जा  झुक गया ,ह्रदय विजयी हुआ और मैंने एक बार पुनः कलम उठाने का निश्चय किया। मैं अत्यन्त आभारी हूँ अपनी पत्नी का जिन्होंने न केवल लिखने के लिए प्रोत्साहित किया बल्कि समय निकाल कर प्रूफ रीडिंग द्धारा मेरी सहायता भी की। मैं अपने प्रयास में कितना सफल हुआ हूँ ये तो पाठको की प्रतिक्रया ही बताएगी

-संजय अग्निहोत्री ‘क्षितिज’