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Once upon a time a king gave a banquet to his entire people and fed them a large variety of dishes. After the banquet on the same night, he sent his detectives to know the thoughts of the people about the banquet. The detectives discovered that the people were gossiping that the king did not provide Papadum in the banquet. They did not expect such a blunder or stinginess from such a great king.


“How long will you take to finish this project?”

The business tycoon Robert Williamson asked the project engineer sat opposite him, David Smith. On hearing this, a victorious smile appeared on David’s face for a moment, before disappearing. He understood that his boss liked his project.

Immediately he replied, “Exactly within one year of the day the finances have been sorted.”

“Ok, I will transfer the entire cost of your project, that is, $ 100 million into the project’s current account today, or rather, right now.” On saying this the boss picked up his phone and began to transfer the money.

“Very well, thank you sir.”

“It’s okay. Keep up the good work.”

“Sir if you don’t mind i would like to ask you something.”

“Go ahead.”

“You do such huge bank transactions simply through your mobile phone. In the interest of security and safety, is this not a dangerous practice?” he stuttered.

Robert Williamson looked at him, smiling as if amused at a child’s innocent question. He then turned the phone towards him and said “I have logged in. Can you try to transfer the money with your hand, so that you can finally be expelled from your doubt?”

David glanced at the screen and saw that he was indeed logged in, and the figure showing on the account was beyond his comprehension. He could not bring himself to take the phone in his own hand. Taken aback, he uttered, “Sir, I…”

Seeing his apprehension, the boss said coolly “Hey, I’m telling you. There’s nothing to be worried about. Go ahead.” On saying this he forced David to take the phone. Suddenly the screen began to show an error message: We are sorry. We have noticed something unusual. Please enter a password within ten seconds for verification or your account will be disabled.

Underneath the message, a countdown appeared and started. David panicked . . .

Chain of Exploitation

It has been about 5 years since Girish started working at this company, and because of his hard work he has already risen to a manager’s position. There’s only two people at home, him and I, his wife Sarita. We don’t even have any kids yet.

We have a maid at home to help me with the house work, and every morning I make breakfast with her help and we eat together as husband and wife. Girish goes to work and I lock the house and take the maid shopping or just out and about. When I don’t go out, I like to sit on the swing in the verandah and read. Even if I do go out, I like to be back home before my husband so that we can have tea together in the evening. After that, in the time Girish takes to shower and freshen up after work, the maid and I whip up dinner – it’s not much work for just the two of us anyway.

I know that the neighbours often talk behind my back about my life and how I have it easy, “sitting on the swing all day”. Perhaps this gossip had circulated and reached Mrs Chawla, a social worker living locally, because one day she decided to spontaneously pay me a visit at home.

I was sitting on the swing when she arrived. When I saw her, I got up and greeted her. After exchanging pleasantries, she asked me, “What are you reading, Sarita?”

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विवाह के पहले भी शाश्वत और शिखा एक ही दफ्तर मे काम करते थे । दोनों के घर भी एक ही मोहल्ले मे पास पास ही थे । शाश्वत की छोटी बहन शशि, शिखा और उसकी छोटी बहन ज्योति एक ही स्कूल मे पढ़ी व साथ साथ पली बढ़ी थी । तीनों मे प्रगाढ़ मित्रता थी । परिवारों मे भी घनिष्ठता थी । इसीलिए जब शिखा की नौकरी शाश्वत के दफ्तर मे लगी तो उसके घरवालों को दफ्तर घर से बहुत दूर होने के बावजूद बड़ी खुशी हुई क्योंकि शाश्वत और उसकी कार के कारण न सिर्फ आने जाने मे सुविधा बल्कि

कहानी संग्रह “भेद भरी…” से


अधीर अपने नाम के अनुसार ही एक स्वच्छंद, उच्शृंगल और उद्दंड प्रकृति का व्यक्ति है कौवे की तरह चौकन्ना, चालाक परन्तु उतना ही सहजबुद्धि से हीन । चालाकी पकड़े जाने पर वो और उसके घरवालों का तर्क होता है कि बेचारे को इस बात का ज्ञान ही नहीं कि वो चालाकी या कोई गलत कार्य कर रहा था इसीलिए पकड़ा गया यानिकि वो और उसके घरवालों ने बुद्धिहीनता को भोलेपन की संज्ञा प्रदान की हुई थी । अपनी मूर्खता के कारण किसी संस्था, संगठन या व्यक्ति से धोखा खाने पर उस संस्था, संगठन या व्यक्ति से सवाल करने के बजाय, उसी युक्ति से किसी और को उसी प्रकार के धोखे मे फँसा…

कहानी संग्रह “भेद भरी…” से

कर्म प्रधान

दिन का करीब 10 बजे का समय होगा । गुरुकुल मे गुरुदेव ने अभी अभी अपनी कक्षा सम्पन्न की है । छात्र एक एक कर उठने और गुरुदेव को प्रणाम कर उनका आशीर्वाद ले अपने लिए पूर्व निर्धारित गुरुकुल के दैनिक कार्यों पर जाने लगे । प्रत्येक दिन की भाँति गुरुदेव ने आँखें बंद कर लीं और ध्यान मुद्रा मे सबको समान रूप से आशीर्वाद देने लगे । थोड़ी ही देर मे कुटिया मे शांति छा गयी परन्तु गुरुदेव ने अनुभव किया कि अभी भी कुटिया मे कोई है । उन्होंने नेत्र खोले तो देखा दो छात्र रणवीर सिंह और नत्थी लाल सर झुकाये विनीत भाव से अभी भी वहीं खड़े…

कहानी संग्रह “भेद भरी…” से

 चंद अशआर

ज़ुबा रखते हैं पर हम, कभी ये भी न कह सके

न हो पाये इधर के और, उधर के भी न रह सके ।


गुज़र ना जाय कहीं उम्र क़हर होने तक

फिसल न जाय समाँ यूँ ही सहर होने तक ।


न आते अक्स जेहन मे बेज़ुबाँ कायरों की तरह,

न करते बात शायद हम बदज़ुबाँ शायरों की तरह ।


देता है दस्तक आयना ज़ेहन के किवाड़ पर

तू आँख बंद करले तो मालिक भि क्या करे ।

जाता है वक्त हाथ से पर तू है बेख़बर

तू दर पे न जाए तो ख़ालिक़ भि क्या करे ।


ये उम्मीद ये समाँ तुम्हें मुबारक हो

हम तो अब सहर की उम्मीद छोड़ बैठे हैं

हम परिन्दों को अब तो चाहिये ये सारा जहाँ

हम तो सय्याद पे भी खार खाए बैठे हैं ।


बात उनकि नहीं जो अपनो से रंज करते हैं

साथ रहकर भि जो अलग थलग रहते हैं

न ही ये बात है उनकी, के जो हैं तलखे जुबां

ये ख़बर उनकि हैं जो पीछे से वार करते हैं ।


ता उम्र उन्हें अपनी हैसियत का गरूर था

और मेरे मिजाज़ में न कोई जी हजूर था ।

रक्खा मेरे मिजाज़ को मौला ने बरकरार

उनका कसूर था मगर मेरा गरुर था ।


अदा इनकी तमाशाई औ फ़ितरत भी बेमानी है

मंज़िल की ख़बर हमको सवारी पर न आनी है

आयें आप भी आयें और, तमाशा गौर से देखें

फ़क़त पैरों से चलना है, राह ख़ुद ही बनानी है ।


चापलूसी करना इनकी फ़ितरत है

और उसको सुनना उनकी आदत है ।

जो कोई अच्छी सलाह देता है

तो खंजर जिगर के पार होता है ।


हर बन्द औ छन्द हो हिन्दी मे
गति तीव्र मन्द हो हिन्दी मे ।

हों कागज़ पत्तर हिन्दी मे

हर प्रश्न का उत्तर हिन्दी मे ।

हों वाद विवाद भि हिंदी मे

औ मुँह मे स्वाद भि हिंदी मे ।

यों हिंदी का गुणगान करें

हम भाषा का अभिमान करें ।

दुनियाँ से क्या डरना

(गीत )

वन को उपवन, सहरा को चमन और शब को सुबह क्या कहना

यारा, दुनियाँ से क्या डरना यारा, दुनियाँ से क्या डरना ।

क्या खूब कुलाबे कमज़ोरी आबाद को वीराँ कहते हैं

हाय शराफ़त मजबूरी हम भी तो वाह वाह करते हैं ।

नफ़रत को अदा, हरकत को बदा, और खुद को खुदा क्या कहना

यारा, दुनियाँ से क्या डरना यारा, दुनियाँ से क्या डरना ।

काजल को चुरा लें आँखों से ये हुनर फ़कत ये रखते हैं

मौसम बदले ये न बदले कुछ ऐसी सिफ़त ये रखते हैं ।

बदनाम को बद शुरुआत को हद, हिकमत को शफ़ा क्या कहना

यारा, दुनियाँ से क्या डरना यारा, दुनियाँ से क्या डरना ।

नाकाम हों इनकी गफ़लत से, हर कदम पे ठोकर हम खायें,

हर मौके भोली सूरत बन ये फ़िर से बिचारे बन जायें ।

तो फ़िर गाफ़िल की गफ़लत को मासूम अदा क्या कहना,

यारा, दुनियाँ से क्या डरना, यारा, दुनियाँ से क्या डरना ।

यारा, दुनियाँ से क्या डरना यारा, दुनियाँ से क्या डरना ।